मंगलवार, 1 अगस्त 2017

लेख

(रायगढ़ का सांस्कृतिक वैभव लेखक डाँ०बलदेव)


राजा चक्रधर सिंह प्रणीत अनूठे संगीत ग्रंथः संगीत नृत्य संबंधी पाँच चर्चित ग्रंथ_ ___________________________

 नर्तन सर्वस्व/तालतोय निधि/तालबल पुष्पाकर/मुरजपरण पुष्पाकर/रागरत्न मंजूषा राजा साहब जब कोई बोल या तोड़ा टुकड़ा या परणों का निर्माण करते तब पहले उसे रफ कॉपी में रिकॉर्ड करते।इसके ब ाद संगीतकारों के बीच उस पर गंभीर विचार विमर्श होता। कई कलाकार अपने अपने ढ़ंग से भाव प्रदर्शन से उस रचना को स्पष्ट करते। जिसमें ज्यादा खूबसूरती मिलती उसे भी अलग से दर्ज करते।इसके बाद राजा साहब अंत में स्वयं उसे तबले पर निकालते । जब संतुष्ट हो जाते और एक प्रकार से सभा में सहमति मिल जाती तब रचना पूरी मानी जाती ।राजा साहब के तबला वादन के साथ ही साथ कविगण उसे श्लोकबध्द करते और चित्रकार मुद्राओं का अंकन करते,यानी भाव प्रदर्शन , नर्तन, वादन के साथ ही साथ लेखन। जिस कवि का श्लोक तथा चित्रकार का चित्र सबसे अच्छा होता उसे फाइनल करते, रजिस्टर में दर्ज करवाते और लेखन कक्ष में भेज देते। पैलेस मैनेजर श्यामलाल जिन्होंने कि मोतीमहल के पहले तल्ले में लेखन कक्ष का चयन किया था, अपनी निगरानी में उसे चिंतामणी कश्यप से लिखवाते। चिंतामणी के सहायक लेखकों में जगदीश प्रसाद थवाईत और लोकनाथ पुरोहित नाम के दो और व्यक्ति थे।लेखन कक्ष में राजा साहब के छोड़ किसी को भी प्रवेश की अनुमति नहीं थी।लेखकों से बाहर भी कोई व्यक्ति बात नहीं कर सकता था। ये लेखक अंतिम रूप दी गई और राजा साहब व्दारा टिक की गई रचनाओं को ब्लू ब्लैक इंक से ग्रंथ निर्माण के लिए लाए गए स्पेशल पेपर पर लेखनीबध्द करते। एक ब्लॉट भी नहीं पड़ने देते। चिंतामणी कश्यप को हेडक्लर्क का वेतन २० रूपए प्रतिमाह दिया जाता था। वे दरबार में राजा की मृत्युपर्यन्त रहे। नर्तन सर्वस्वमः-नर्तन सर्वस्वम कथक के अंग उपांग का संपूर्ण ग्रंथ है। मजबूत काली जिल्द से बंधा यह ग्रंथ खासतौर पर कथक नृत्य का सबसे बड़ा और प्रमाणिक ग्रंथ है।इसके मुख पृष्ट पर सुनहरे अक्षरों से लिखा हुआ है- ऩर्तन सर्वस्वम।उसके नीचे राजा चक्रधर सिंह का नाम है तथा सबसे नीचे १९३८ ई० लिखा हुआ है। नर्तन सर्वस्वम का मुख्य आधार है भरतमुनि प्रणीत नाट्य शास्त्र, राजा सवाई प्रताप सिंह जयपुर व्दारा लिखित और २५ जून १९१० को प्रकाशित राधा गोविंद संगीत सार, श्री दुर्गाप्रसाद व्दारा प्रणूत संगीत दर्पण। किवंदती यह भी है कि नर्तन सर्वस्वम का असली आधार विशाखदत्त प्रणीत नर्तन रहस्यम है। इसके श्लोक को संस्कृत भाषा में आबध्द करने वाले आचार्यों के नाम इस प्रकार हैं- जानकी वल्लभ शास्त्री,व्याकरणाचार्य पंडित सदाशिव दास, साहित्याचार्य पं० भगवान पांडे तथा कवि भूषण। दुर्लभ ग्रंथ नर्तन रहस्यम मे १००० से अधिक पृष्ट है। ३५० पृष्ठों की तो भूमिका ही है।इसे सबसे पहले सन १९३८ में अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन इलाहाबाद में अवलोकनार्थ रखा गया था। रायगढ में जो भी विद्ववान आते राजा साहब सबसे पहले उन्हें इसी ग्रंथ को दिखाते थे।राजा साहब के निधन के बाद वह ग्रंथ छोटी रानी लोकेश्वरी देवी के पास सन १९७७ तक रहा।इसके बाद महाराज कुमार सुरेन्द्र कुमार के हाथों सौंप दिया गया तब से ग्रंथ उन्हीं के पास सुरक्षित है। तालबल पुष्पाकर :- सुलेखक चिंतामणी कश्यप के अनुसार यह ग्रंथ भी अपूर्ण लिखा गया है।इसके लिए तबले के बोल परन रफ में बना कर तैयार हैं।१९४६ में राजा साहब की आज्ञा से खम्हार ऑफिस में कार्य करना पड़ा । हो सकता है इस ग्रंथ को जगदीश थवाईत जी ने तैयार किया हो। तालबल पुष्पाकर की रफ कॉपी मझले कुमार के पास अब भी उपलब्ध है।इसे तुलसी राम देवांगन, महेन्द्र प्रताप सिंह और प्यारे लाल श्रीमाल ने खुद अपनी आँखों से देखा है और इनके बीरे में कई जगह जिक्र भी किया है। इल ग्रंथ में राजा साहब ने तबले के इतिहास पर शुरू में प्रकाश डाला है ।तबले की उत्पत्ति ताल और बल से मानते हैं। तालबल पुष्पाकर के अनुसार ताल तो एक है राकेन्दु ताल जिसे त्रिताल कहा जाता है, पर यहाँ उपभेद २०५७ बतलाए गए हां।यहाँ कायदा,रेला,पेशकार और तिहाइयों का भी सुन्दर वर्णन हुआ है ।वास्तव में तालबल पुष्पाकर तबला पर ही केन्द्रित ग्रंथ है। तालतोय निधि:- तालतोय निधि शायद भारतीय नृत्य संगीत का संबसे बड़ा ग्रंथ है। इसका कुल वजन ३२ किलो है। इस ग्रंथ को १९३८ में शुरू किया गया था जो कि माघ स० १९९७ बंसत पंचमी ,शनिवार , तारीख १/२/१९४१ को पूरा हुआ था। सुलेखक चिंतामणी कश्यप के अनुसार इसमें एक से लेकर २८४ मात्राओं तक के ताल आबध्द है। इसके तालों के बोल संस्कृत और हिन्दी दोनों में लिखे गए हैं। इसमें तालों के बोल, तालांग दून,चौगुने रेला एंव परण चक्र के अंदर लिखे गए हैं। इसमें १७,१९ जैसे विषम मात्रा के भी ताल हैं। राजा साहब ने उस्तादों को पर्याप्त धन देकर ,उन्हें खुश करके उनसे एक एक बोल प्राप्त किए थे। कहा जाता है नत्थू खां ने राजा के सामने बुलबुल परण से बुलबुल को चहकाया था। वह परण भी इस ग्रंथ में शामिल है ।कुछ विशिष्ट तालों के नाम हैं -- सवारी ताल, सरस्वती ताल,सप्तमुख ताल,सन्तिपाल ताल, दशमुख ताल, कलिंग ताल, लक्ष्मण विलास ताल अादि। मुरजपरण पुष्पाकर:- यथां नामं तथा गुणं के मुहावरे को चरितार्थ करने वाला तीसरा ग्रंथ है- मुरज परण पुष्पाकर । यह पखवज के बोल,परणों का खजाना है।इसमें ताल,परण,अंग,अणु, द्रुत, लघु, गुरूओं का विस्तार से वर्णन है। इस ग्रंथ को लिखने में तीन वर्ष (१८४३-१९४५) लगे। दरबार के नर्तक और वर्तमान में उनके शिष्यगण इसी ग्रंथ के बोल,परणों पर अधिकाँशतह नृत्य किया करते है। यह हरी और लाल जिल्दों की दो खण्डों में लिखा गया था । उसका हिन्दी अनुवाद भी दिया गया है । रागरत्न मंजूषा:- रागरत्न मंजूषा में १२०० राग-रागनियों का वंशवृक्ष सहित वर्णन है। इसकी पाण्डुलिपि शायद पंडित भूषण संगीताचार्य ने बनाई थी, राग रत्न मंजूषा संगीत पारिजात,अभिनव राग मंजरी जैसे प्रसिध्द ग्रंथों के आधार पर तैयार की गई थी।लेकिन सुलेखक चिंतामणी कश्यप बतलाते हैं यह ग्रंथ भी पूरा लिखा नहीं गया है सिर्फ राग के प्रकार गीत,सरगम आदि रफ में तैयार किया गया है । जैसा कि मझले कुमार बतलाते हैं उनके पास जीण-शीर्ण कापी है, उसमें भूषण महाराज के हस्ताक्षर है। इसमें राग और ३६ रागिनियों के अंग उपांगों का वर्णन है इस ग्रंथ का आधार राग विबोध, रागमाला आदि ग्रंथ है। 

 (विस्तार से जानने के लिए देखे:- रायगढ का सांस्कृतिक वैभव:- लेखक डाँ०बलदेव।)

रायगढ़ घराने के चार कीर्ति स्तंभ:-डाँ. बलदेव

रायगढ़ घराने के चार कीर्ति स्तंभ:-- -------------------------------------------- लेखक:-डाँ. बलदेव राजा चक्रधर सिंह को कथक नृत्य के विकास के लिए योग्य शिष्यों की तलाश थी। अक्सर गणेशोत्सव के समय जो गम्मत या नाचा पार्टियां आती, उन्हीं में से बाल कलाकारों का चुनाव किया जाता था। बाकायदा इन बाल कलाकारों का खर्चा , आवास व्यवस्था समेत 25 रूपये माहवारी छात्रवृति भी दी जाती थी। दरबार में प्रथम नृत्य गुरु जगन्नाथ प्रसाद थे और उनका पहला शिष्य थे अनुजराम मालाकार । वे रायगढ़ के पूर्व नेपाल दरबार में नियुक्त थे। कालांतर में पं. कार्तिकराम, कल्याणदास, फिरतू महाराज एवं बर्मनलाल जी इस घराने से दीक्षित होकर चार कीर्ति स्तंभ के रुप में सामने आये। पं. कार्तिकरामः- -------------------- अपने जीवन में कथक.नृत्य का पर्यायवाची बन गये कार्तिकराम का जन्म चांपा-जांजगीर के एक छोटे से गाँव भंवरमाल में सन् 1910 में हुआ था। वे अपने चाचा माखनलाल की गम्मत नाचा पार्टि में बतौर बाल कलाकार के रुप में हिस्सा लिया करते थे। एक दफा गणेश मेला के दौरान परी के रूप में राजा चक्रधर सिंह ने उन्हें देख लिया। बालक जितना सुन्दर था उसका पद चालन उतना ही सघन। राजा साहब ने तुरंत उन्हें दरबार के लिए चुनकर खान-पान और 25 रूपये मासिक वजीफे की व्यवस्था कर दी। कार्तिकराम की प्रारंभिक शिक्षा स्व. शिवनारायण, सुन्दरलाल, मोहनलाल और अच्छन महाराज के जरिये हुईं। उन्हें अच्छन महाराज से लास्य एवं शंभू महाराज से गति की तालीम मिली जबकि लच्छू महाराज से भाव पक्ष। कार्तिकराम जी को पहली प्रसिध्दि मिली इलाहाबाद म्यूजिक काँन्फेंस में वहां रायगढ़ दरबार की धूम मच गई, और कार्तिक समुचे देश में प्रसिद्ध हो गये। एक बार पुनः राजा साहब ने इलाहाबाद के उसी आखिर भारतीय संगीत समारोह मे कार्तिक राम के साथ कल्याणदास को मंच पर उतारा। स्वयं तबले पर संगति भी की। 1938 (रायगढ़ टाउन हॉल),1940(जालंधर),1940(मेरठ),1942(बिहार बैजनाथ धाम), 1943(मिरजापुर), 1945(कराची), इटावा 1954 के अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन में अपना एवं अपने साथ रायगढ़ दरबार का नाम रोशन करने वाले कार्तिकराम जी ने देश का कोई ऐसा समारोह न था जहाँ दस्तक न दी हो।अपने समय के इस महान नर्तक को सन् 1978 में संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप एवं 1981 मे शिखर सम्मान (भोपाल) समेत अनेक सम्मान प्राप्त हुए थे। पं. कल्याण दासः- प्रो. कल्याण दास देश के महान नर्तकों में से एक थे।उनका जन्म जांजगीर जिला के नवापारा गांव में 10अक्टूबर, सन् 1921 को हुआ था।पिता कुशलदास महन्त स्वयं संगीतज्ञ थे।वे इसराज, सारंगी आदि बजाने में प्रवीण थे।कल्याण दास बचपन से ही नृत्य की शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। उनकी आवाज. भी बड़ी मीठी थी। संयोग से एक बार राजा चक्रधर सिंह ने सांरगढ़ दरबार में बालक कल्याणदास को नाचते हुए देख लिया, वे इस कदर प्रभावित हुए कि अपने ससुर से कल्याण दास को मांग कर उसे शिष्य बना लिया।कल्याणदास दरबार में अनुजराम, कार्तिकराम, और फिरतू महाराज के बाद आए। उन्हें कथक नृत्य की शिक्षा पं. जयलाल महाराज, अच्छन महाराज(भाव), लच्छू महाराज(अभिनय),शंभू महाराज (तीन ताल एंव खूबसूरती), नारायण प्रसाद(एक ताल), आदि गुरुओं से मिली। ख्याल, टप्पा, ठुमरी और गजल की तालीम हाजी मोहम्मद से प्राप्त की और नत्थू खाँ से उन्होंने तबले की उच्च शिक्षा ली। मुनीर खाँ, कादर बख्श और अहमद जान थिरकवा से तबले के कठिन कायदे सीखें। राजा साहब उन पर खास ध्यान दिया करते थे। नृत्य सम्राट कल्याणदास को पहली बार 1936 में इलाहाबाद म्यूजिक काँन्फेंस में उतारा गया। इसके बाद मेरठ, बरेली1934,रायगढ़1942,दिल्ली1944,खैरागढ़ आदि के अखिल भारतीय संगीत सम्मेलनों में भाग लेकर पुरस्कार प्राप्त किया। 1964 में वे इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ में प्रोफेसर नियुक्त हुए। मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग से शिखर सम्मान प्राप्त कल्याण दास ने अपने अंतिम दिनों में भाव नृत्य नाम का एक सुंदर ग्रंथ भी लिखा। पं. बर्मनलाल:- कथक नृत्य के शिखर पुरूष पं. बर्मनलाल स्वयंसिध्द कलाकार थे। उनका जन्म वर्तमान चांपा-जांजगीर जिला में 24 अप्रेल, सन् 1916 को हुआ था और देहावसान 86 वर्ष की उम्र में 2 फरवरी,2005 को । पिता अजुर्नलाल किसान थे। वे चिकारा (सारंगी) के कुशल वादक थे। जैजैपुर निवासी उनके मातुल शिवप्रसाद एवं मुकुतराम इस अंचल के चर्चित गम्मतकार थे। बर्मनलाल जी को संगीत की आरंभिक शिक्षा पिता एवं मातुल श्री से प्राप्त हुई। बचपन से नाचा के कलाकार थे। उनके मातुल श्री मुकुतराम और घुरमिनदास राजा भूपदेव सिंह तथा चक्रधर सिंह के दरबारी कलाकार थे। ये दो कलाकार , जयपुर घराने के गुरु नारायण प्रसाद और सीताराम जी व्दारा पहली बार कथक में दीक्षित हुए। जब राजा चक्रधर सिंह गद्दीनशीन हुए तो उन्होंने मुकुतराम जी को दरबार में फिर से बुला लिया। उन्हीं के साथ मात्र आठ नौ वर्ष की उम्र में बर्मनलाल जी रायगढ़ आए। दुबारा वे 1929 में रायगढ़ आए। किशोर बर्मनलाल जी के नृत्य से प्रभावित हो कर राजा चक्रधर सिंह ने उन्हें नृत्य संगीत की ऊंची तालीम दिलाई। इसी पृष्ठभूमि पर उन्होंने राजा चक्रधर सिंह के नेतृत्व में अपने गुरु भाईयों पं. कार्तिकराम , पं. कल्याण दास महन्त, पं. फिरतू महाराज के साथ साथ एक नूतन नृत्य शैली को जन्म दिया। बर्मनलाल जी को कथक की शिक्षा जयपुर घराने के जयलाल महाराज, सीताराम, नारायण प्रसाद और लखनऊ घराने के उस्ताद अच्छन महाराज, लच्छू महाराज, शंभू महाराज से गणितकारी (ताल-वाद्य) और नारायण प्रसाद से गायन की शिक्षा मिली। प्रसिद्ध तबलावादक कादर बख्श और नत्थू खाँ से तबले की शिक्षा ली। बर्मनलाल जी उन भाग्यवान शिष्यों में थे, जिन्हें जयपुर और लखनऊ दोनों घरानों की शिक्षा मिली। बर्मनलाल जी रायगढ़ दरबार में सन् 1932 से 1947 तक नृत्य की कठिन साधना करते रहे। सन् 1936 में इलाहाबाद और कानपुर के सम्मेलनों में वे प्रथम आए। इससे राजा चक्रधर सिंह इतने प्रसन्न हुए कि उन्हें केलो तट पर रहने के लिए पर्याप्त जगह दे दी और फिर बर्मनलाल जी रायगढ़ निवासी हो कर रह गए। राजा चक्रधर सिंह की चर्चा मात्र से वे रोमांचित हो जाते थे। वे होठों से ही बांसुरी का ऐसा मधुर स्वर निकालते थे कि लोग चकित हो जाते थे। वे शायरी का भी शौक रखते थे। मौके पर शेर कह देना उनके लिए बाँए हाथ का खेल था। बर्मनलाल जी को सबसे पहले 26 जनवरी, 1954 को राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मध्यप्रदेश राज्य सरकार की ओर से माननीय मंडलोई जी ने उन्हें प्रशस्ति पत्र दे कर सम्मानित किया। गांधर्व महाविद्यालय देहली, प्रयाग संगीत समिति, इलाहाबाद, श्रीराम संगीत महाविद्यालय रायपुर, भातखम्डे संगीत महाविद्यालय बिलासपुर और अनेक निजी तथा शासकीय सांस्कृतिक संस्थाओं ने भी उन्हें सम्मानों, पुरस्कारों से नवाजा था। पं. बर्मनलाल जी के चलनेे-फिरने की हर अदा में नृत्य संगीत प्रकट होता था। पं. फिरतू महाराज:- फिरतू महाराज का जन्म मेरे गाँव नरियरा के ही पास के गाँव बुंदेला मे 7जुलाई, 1921 को एक मंदिर के पुजारी के यहाँ हुआ था। रायगढ़ दरबार के हारमोनियम मास्टर मुकुतराम जी अक्सर अपने रिश्तेदार के यहाँ. बुंदेला जाते थे, और फिरतू महाराज के पिता त्रिभुवन दास वैष्णव के पास बैठते थे। उन्होंने रायगढ़ दरबार के लिए फिरतू और भाई घासी को उनके पिता से मांग लिया। फिरतू महाराज 1929 में मुकुतराम के साथ रायगढ़ आए। कार्तिकराम के बाद जयलाल महाराज के दूसरे शिष्य के रूप में फिरतू महाराज की शिक्षा शुरू हुई। पंडित जी इन दोनों बालकों को एक साथ नृत्य सिखलाते थे। पं. फिरतू महाराज ने जयलाल महाराज से तबले की भी शिक्षा ली। अच्छन महाराज, सीताराम जी और हरनारायण से गायन की, जगन्नाथ महाराज से भाव-नृत्य की, और मुहम्मद खाँ और छुट्टन भाई से गायन की तालीम पाई। फिरतू महाराज स्वतंत्र विचारों के कलाकार थे। अपने गाँव में उन्होंने भागवतदास नाम के एक लड़के को कथक में इतना योग्य बना दिया कि वह बड़े मंचों में भी प्रशंसित और पुरस्कृत होने लगा। एक बार फिरतू महाराज ने स्वयं उसे रायगढ़ गणेशोत्सव की प्रतियोगिता में उतारा। पं. जयलाल महाराज वहाँ उपस्थित थे। राजा साहब भागवतदास का नृत्य देख कर चमत्कृत हो गए और सोचने लगे कि फिरतू दास इसी तरह लड़को को गाँव में तालीम देते रहे तो दरबार के नौनिहालों का क्या हाल होगा? राजा साहब ने उन्हें रायगढ़ में फिर नियुक्त करना चाहा , पर वे नहीं माने और सीधे गाँव लौट गए।. उन्हें सबसे पहले 1933 में कार्तिकराम और जयकुमारी के साथ म्यूजिक काँन्फेंस आँफ इलाहाबाद (विश्वविद्यालय हाल) में उतारा गया।वहाँ उन्हें पुरस्कार एवं प्रमाण पत्र हासिल हुआ। दूसरी बार वे 1936 में इलाहाबाद के संगीत सम्मेलन में भाग लिए जहाँ राजा साहब स्वयं उपस्थित थे। तीसरी बार वे राजा चक्रधर सिंह के साथ कानपुर के संगीत सम्मेलन में गए। उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में बड़ी संख्या में उन्होंने शिष्य तैयार किए। फिरतू महाराज में ताण्डव की प्रमुखता थी। वे पढ़न्त में माहिर थे। पं. रामलाल:- दरबार की प्रमुख हस्तियों में अनुजराम, कार्तिकराम, मुकुतराम, फिरतू दास, कल्याण दास और बर्मनलाल के बाद पं. कलागुरु रामलाल नृत्याचार्य का नम्बर आता है। रामलाल को नृत्य की प्रारंभिक शिक्षा उनके पिता कार्तिकराम जी , फिर पं. जयलाल एवं दर्जनों गुरुओं से रायगढ़ दरबार में मिली थी। रामलाल जी का जन्म 6मार्च, 1936 को हुआ था। उनकी शैक्षणिक शिक्षा भले ही मिडिल स्कूल तक हो पाई , परन्तु उन्हें नृत्य संगीत की ऊंची शिक्षा मिली है, जो संगीत विद्यालयों में उस समय दुर्लभ थी। रामलाल जी ने 4 वर्ष की उम्र से नृत्य संगीत की शिक्षा 11वर्षों तक ली। कार्तिकराम जी के अनुसार वे उनके साथ करीब -करीब देश के सभी बड़े बड़े शहरों में कार्यक्रम दे चुके हैं। रामलाल नृत्य के अलावा तबला वादन और ठुमरी गजल गायकी में विख्यात हैं। राजा साहब कृत निगाहें-फरहत और जोशे फरहत के सैकड़ों शेर उन्हें आज भी कण्ठस्थ हैं। म.प्र. के भोपाल स्थित चक्रधर नृत्य केन्द्र में लम्बी अवधि तक नृत्य गुरु के रूप में सेवाएं देने का सुदीर्घ अनुभव रहा है। आपके प्रमुख शिष्यों में सुचित्रा डाकवाले, अल्पना वाजपेयी, रुपाली वालिया, मोहिनी पूछवाले, विजया शर्मा, भूपेन्द्र बरेठ , दादूलाल, अनुराधा सिंह आदि है। 1995 में संगीत नाटक अकादमी नई दिल्ली से से पुरस्कृत एवं छत्तीसगढ़ शासन संस्कृति विभाग का चक्रधर सम्मान 2006 प्राप्त हुए है। लेखक:- डाँ.बलदेव श्री शारदा साहित्य सदन, स्टेडियम के पीछे, श्रीराम काँलोनी,चक्रधर नगर, रायगढ़ मो.नं.9826378186 -- Sent from Fast notepad

बुधवार, 26 जुलाई 2017

रायगढ़ का कथक घराना:-लेखक-डाँ. बलदेव

रायगढ़ का कथक घराना:-लेखक:-डाँ बलदेव --------------------------------------------------- कथक को उसके मूल संस्कार और नये संदभों से जोड़कर उसे पुनः शास्त्रीय स्वरूप में प्रस्तुत करने में रायगढ़ दरबार का महत्वपूर्ण योगदान है। रायगढ़ नरेश चक्रधर सिंह के संरक्षण में कथक को फलने फूलने का खूब अवसर मिला। इस दरबार ने कार्तिक, कल्याण, फिरतू, बर्मन और रामलाल जैसे श्रेष्ठ कथक नर्तक तैयार किये। इसकी अपनी विशिष्ट शैली रही उसी शैली से निखरकर काफी शिष्य कालांतर में तैयार हुए। राजा साहब विशुद्ध कला पारखी थे। वे कला का संबंध आत्म कल्याण के साथ ही जन रूचि के परिष्कार से जोड़ते थे।उन्होंने नित नवीन प्रयोगशील कथक को शास्त्रीय स्वरूप देना चाहा । इसके लिए उन्होंने लखनऊ एंव जयपुर दोनोँ घरानों के आचार्यों का सहयोग आवश्यक समझा । नृत्य-संगीत के प्रायः सभी घरानों के गंभीर अध्ययन और विद्वानों के साथ चिन्तन -मनन के पश्चात यह नृत्य शैली रायगढ़ कथक घराना के नाम से 1978 में प्रचारित-प्रसारित की गई । विशेषताएं:- ------------- रायगढ़ घराने के कथक ने इन दोनों घरानों की मिश्र शैली का नायाब उदाहरण नजर आता है। यहाँ जयपुर जैसी तैयारी है तो लखनऊ जैसा भाव प्रदर्शन और खूबसूरती । यहाँ का ठाठ न तो जयपुर घराने सा बड़ा न लखनऊ सा छोटा। यहाँ हवा में लहराते केतु के प्रतीक त्रिपटाकहस्त का अधिक महत्व है, इसलिए राजा साहब ठाठ की जगह त्रिपटाकहस्त कहना अधिक पंसद करते थे। उस समय जयपुर में विलंबित का काम अधिक होता था । लखनऊ में कम, लेकिन अति विलंबित का यहीं से प्रारंभ हुआ। यहाँ की अति विलंबित लय उस समय 64 मात्राओं तक की होती थी । संकीर्ण, खण्ड, मिश्र, तिश्र एंव पाँच जातियों का प्रयोग यहाँ की खासियत है । चक्करदार परण यहीं की उफज है। रायगढ़ घराने की कथक की सबसे बड़ी विशेषता है - उसका शास्त्र सम्मत होना और शास्त्र का अप्रतिम और अप्रकाशित ग्रंथ है। - नर्तक सर्वस्वम्। इस प्रकार रायगढ़ घराने का कथक अभिनय, समस्त रसों, भावों-अनुभावों से युक्त मुद्राओं से परिपूर्ण है। दिग्गजों का दस्तक:- वस्तुतः कथक का देश में आज जो स्वरूप है उसका विकास रायगढ़ दरबार में ही हुआ। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में रायगढ़ में प्रसिद्ध कथकों एंव संगीतज्ञों का आना जाना शुरु हो गया था। यहां चुन्नीलाल, मोहनलाल, सोहनलाल, सीताराम, चिंरजीलाल, झंडे खाँ, और शिवनारायण आदि कथकाचार्य तो राजा चक्रधर सिंह के बचपन में ही आ गए थे। इतना ही नहीं जमाल खाँ, सादिक हुसैन(तबला), चाँद खाँ(सारंगी), करामतुल्ला, कादर बख्श, अनोखेलाल, प्यारेलाल, प्यारे साहब(गायन),ठाकुर दास,मंहत,पर्वतदास(पखावज),आदि संगीतज्ञ भी राजा भूपदेव सिंह के दरबार की शोभा बढ़ाते थे। राजा भूपदेव सिंह के समय मोहरसाय, घुरमीनदास और सहसराम को पहले-पहल कथक की शिक्षा देने का उपक्रम हुआ। पंडित चुन्नीलाल, शिवनारायण और झंडे खाँ इनके गुरु नियुक्त हुए। कार्तिक राम के चाचा माखनलाल और अनुज के पिता जगदेव माली उस समय इस क्षेत्र के प्रसिद्ध लोक-नर्तक थे। राजा भूपदेव सिंह की इन पर विशेष कृपा थी। इन्होंने भी कार्तिकराम और अनुजराम के लिए जमीन तैयार की। राजा नटवर सिंह के देहांत के बाद राजा चक्रधर सिंह शासक हुए और शीघ्र ही रायगढ़ संगीत, नृत्य और काव्य का त्रिवेणी संगम हो गया। शासक की बागडोर संभालते हुए अपना ध्यान कथक और संगीत के विकास पर केन्द्रित किया। उन्होंने शिवनारायण, जगन्नाथ प्रसाद, पं. जयलाल, अच्छन महाराज, शिवलाल, सुखदेव प्रसाद, सुन्दरलाल, हनुमान प्रसाद, झंडे खाँ,लच्छू महाराज, शंभू महाराज, सीताराम, ज्योतिराम, मोतीराम आदि श्रेष्ठ आचार्यों की नियुक्ति की। घराने का वैशिष्टय:- रायगढ़ घराने के अस्तित्व का सबसे बड़ा आधार राजा साहब व्दारा निर्मित नये-नये बोल और चक्करदार परण है। जो नर्तन सर्वस्व, तालतोयनिधि, रागरत्न मंजूषा, मुरजपरण पुष्पाकर और तालबल पुष्पाकर में संकलित है। उनके शिष्य अधिकांशयता उन्हीं की रचनाएं प्रदर्शित करते हैं। यहाँ कड़क , बिजली, दल बादल, किलकिला परण जैसे सैकड़ों बोल, प्रकृति के उपादानों, झरने, बादल, पशु-पक्षी आदि के रंगध्वनियों पर आधारित है। जाति और स्वभाव के अनुसार इनका प्रर्दशन किया जाए तो ये मूर्त हो उठते हैं। (कार्तिक-कल्याण की जोड़ी की बेमिसाल प्रतिभा को पहचान कर जब दतिया नरेश ने राजा साहब से इन दोनों की मांग की, तो राजा चक्रधर सिंह ने इन्हें अपनी दोनों आँखे बताकर इन्हें कुछ दिन के लिए भी देने से इनकार कर दिया था) -- Sent from Fast notepad

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

गाँव (कविता)बसन्त राघव

गांव 
____ 
 मैं तो गांव जातेंव संगवारी 
 गांव जातेंव शहर म जीव असकट होगे
 मैं तो गांव जातेंव महतारी के अंचरा ल धर के 
 मैं पाछू पाछू किंदरतेंव 
बनके सुरता कर कर मैं लइका बनतेंव 
गली के धुर्रा माटी म लोट पोट होके मैं खेलतेंव 
 जिहाँ जिहाँ खेलौं मैं भंवरा अउ बांटी
 उहें जाके खेलतेंव मैं फेर भंवरा बांटी 
पीपर के पीपरी ल बिन बिन मैं खातेंव 
उल्हा पाना पीपर के सीसरी बजातेंव
 मैं तो गांव जातेंव.... 
 गिया गांठी के संगे संगे बटुरा के खेत म उतरतेंव 
नइ तो बरछा म पेल के कुसियार ल चुहकतेव 
गातेंव में साल्हो ददरिया अउ बनतेंव मैं कन्हैया सुआ - भोजली के गीत सुन के साध लगथे 
संगवारी मोर मैं तो गांव जातेंव
 साध हांवे अउ बड़का ठाकुर देव के चौरा म ढुलगंतेंव 
चढ़े परसाद जेकर हेर हेर खातेंव 
ठाकुर देव ल ठगतेंव थोरकन थोरकन ठगातेंव।
 सुरता आथे संगवारी मोर गांव 
 चंदा -सुरुज , तलाव पोखरी तिरैया संझा के याद आथे सुरता आथे कोइली के कूक अउ तोता मैना के मिठ्ठ बोली के मन होथे संगी पंड़की परेवा कस उड़ जातेंव गाँव म
  मैं तो गांव जातेंव संगवारी 
 मैं तो गांव जातेंव । 
        * * *

 बसन्त राघव पंचवटी नगर,बोईरदादर,रायगढ़,छत्तीसगढ़ मो.न. 9039011458 ं -- Sent from Fast notepad

शनिवार, 18 मार्च 2017

लघुकथा :-मित्र का उदास चेहरा सूर्ख होता हुआ

लघुकथा मित्र का उदास चेहरा सूर्ख होता हुआ --------------------------------------------- दोनों में जब भी बहस होती थोड़ी देर बाद उसका स्टाँक खत्म हो जाता और वह उत्तेजित होकर सहसा ही चुप हो जाता। मेरी संवेदनशीलता बढ़ जाती और बगैर उससे सहमत हुए भी उसे खुश करने में लग जाता।आज उन दिनों का स्मरण करता हूँ तो सुखद आश्चर्य से भर जाता हूँ। उन दिनों हम एक साथ रहते थे, परन्तु एक दूसरे से शायद ही कभी हम सहमत हुए हों और आज तो असहमति इतनी बढ़ गयी है , कि उससे दूर रहने में ही कुछ अधिक अच्छा लगता है। उसका अहंकार फल-फूल रहा है, जलन मुझे हो रही है, यह हमारी नियति है। उन दिनों हम दोनों के बीच नये विषयों पर खूब बहस होती थी। देश-विदेश के समाचार जो हमें अखबारों से मिलते थे उसकी हम अनाधिकार काट-छांट किया करते थे, जैसे स्वयं हम उसे रिप्रिंट करने जा रहे हों, लेकिन बीच में कुछ ऐसा होता कि हम एक दूसरे के विचारों की कतरव्योंत करने लगते और आए दिन किसी विचार पर हम झगड़ बैठते। फासला बढ़ जाता , लेकिन ज्यादा दिन अलगाव की स्थिति नहीं रह पाती। फासला धीरे धीरे कम होता और हम फिर बहसबाजी में उलझ जाते। दरअसल बहस के बिना हम एक क्षण भी नहीं रह सकते। चार-चार, पांच-पांच दिनों के फासलों के बीच भी अपने आप तर्क कुतर्क करते या अपनी बातों के पक्ष में जन-समर्थन जुटानें में लग जाते। बहुत वर्ष हो गए हम अलग अलग मकान में रहते आ रहे हैं। अब बहस नहीं होती , मुलाकातें भी कहां हो पाती है। हम कब अलग हुए , इस बात का स्मरण करने की इच्छा बिना ही स्मरण कर रहा हूँ। मई का महीना था और रविवार पड़ा था। मैं उसे स्टेशन तक छोड़ने गया.था। उस समय हम दोनों अत्यधिक भावुक थे। बातें कम हो रही थी लेकिन अच्छी हो रही थी। टिकिट मैंनें उसके हाथ में थमा दी। प्लेट फार्म नं.4 में गाड़ी आने वाली थी, लेकिन वह घन्टे भर लेट थी और हम फिर किसी बात को लेकर उलझ पड़े। वह मेरी बात माननें को तैयार नहीं , मैं उसकी नहीं। गाड़ी आने पर दोनों का ध्यान उधर गया। मैं झटपट सामान को चढ़ाकर उसे बर्थ पर बैठा, नीचे उतर गया गाड़ी आई और गयी। मेरा मित्र का हाथ हिला और मैं लौट पड़ा। लौटते हुए उन बातों को याद कर रहा था कि किस बात को लेकर हम उलझ गये थे, लेकिन वह बात याद नहीं आ रही थी। कुछ ऐसा लग रहा था कि बहुत कुछ छूट गया है। मन कचोट रहा था, लम्बी सड़क और लम्बी हो रही थी, एकदम सूनी सूरज की जगह मित्र का उदास चेहरा आसमान में सूर्ख हो रहा था। 
 बसन्त राघव
 पंचवटी नगर, बोईरदादर,रायगढ़, छत्तीसगढ़ मो.नं.9039011458 -- 

मंगलवार, 14 मार्च 2017

तलाश (कविता)

तलाश 
-------- 
 पाषाण जैसी जिन्दगी
 नरम घास कहाँ तलाश करुँ 
सर्द अंधेरी रात है, 
सूर्य -किरण कहाँ तलाश करुँ 
 रिसता है घाव बहुत गहरा
 हंसने के बहाने कहाँ तलाश करुँ 
 नदियों में गटरों का गन्दा जल 
 पतित पावनी कहाँ कहाँ तलाश करुँ 
 हर शख्स है यहाँ जाना-पहचाना
 नया इंसान कहाँ कहाँ तलाश करुँ 
दग़ा दे गया कोई सपना 
 सच्चाई कहाँ तलाश करुँ 
दग़ा दे गया कोई अपना 
 दर्दे दिल कहाँ तलाश करुँ 
 गोखरु गड़ रहे पांवों में
 बियाबान में लोचनी कहाँ तलाश करु 
हमसफर हमराज हो गये
 तुरुप का बेगम कहाँ तलाश करुँ 
**      ***         ***
 बसन्त राघव 
पंचवटी नगर, बोईरदादर,रायगढ़,
छत्तीसगढ़ -- 8319939396

शुक्रवार, 10 मार्च 2017

तलाश (कविता) बसन्त राघव

तलाश 
--------
 पाषाण जैसी जिन्दगी 
नरम घास कहाँ तलाश करुँ 
सर्द अंधेरी रात है, 
सूर्य -किरण कहाँ तलाश करुँ 

 रिसता है घाव बहुत गहरा 
हंसने के बहाने कहाँ तलाश करुँ 
 नदियों में गटरों का गन्दा जल 
 पतित पावनी कहाँ कहाँ तलाश करुँ

 हर शख्स है यहाँ जाना-पहिचाना 
नया इंशान कहाँ कहाँ तलाश करुँ 
दग़ा दे गया कोई सपना 
 सचाई कहाँ तलाश करुँ 

दग़ा दे गया कोई अपना
 दर्दे दिल कहाँ तलाश करुँ 

 गोखरु गड़ रहे पांवों में 
बियाबान में लोचनी कहाँ तलाश करु 
हमसफर हमराज हो गये 
तुरुप का बेगम कहाँ तलाश करुँ 
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 बसन्त राघव 
पंचवटी नगर, बोईरदादर,रायगढ़,छत्तीसगढ़
मो.नं.8319939396