शनिवार, 13 अगस्त 2016

राजा चक्रधर सिंह प्रणीत अनूठे संगीत ग्रंथ: लेखक-डाँ. बलदेव

(रायगढ़ का सांस्कृतिक वैभव लेखक डाँ०बलदेव)राजा चक्रधर सिंह प्रणीत अनूठे संगीत ग्रंथः संगीत नृत्य संबंधी पाँच चर्चित ग्रंथ_ ___________________________ नर्तन सर्वस्व/तालतोय निधि/तालबल पुष्पाकर/मुरजपरण पुष्पाकर/रागरत्न मंजूषा राजा साहब जब कोई बोल या तोड़ा टुकड़ा या परणों का निर्माण करते तब पहले उसे रफ कॉपी में रिकॉर्ड करते।इसके ब ाद संगीतकारों के बीच उस पर गंभीर विचार विमर्श होता। कई कलाकार अपने अपने ढ़ंग से भाव प्रदर्शन से उस रचना को स्पष्ट करते। जिसमें ज्यादा खूबसूरती मिलती उसे भी अलग से दर्ज करते।इसके बाद राजा साहब अंत में स्वयं उसे तबले पर निकालते । जब संतुष्ट हो जाते और एक प्रकार से सभा में सहमति मिल जाती तब रचना पूरी मानी जाती ।राजा साहब के तबला वादन के साथ ही साथ कविगण उसे श्लोकबध्द करते और चित्रकार मुद्राओं का अंकन करते,यानी भाव प्रदर्शन , नर्तन, वादन के साथ ही साथ लेखन। जिस कवि का श्लोक तथा चित्रकार का चित्र सबसे अच्छा होता उसे फाइनल करते, रजिस्टर में दर्ज करवाते और लेखन कक्ष में भेज देते। पैलेस मैनेजर श्यामलाल जिन्होंने कि मोतीमहल के पहले तल्ले में लेखन कक्ष का चयन किया था, अपनी निगरानी में उसे चिंतामणी कश्यप से लिखवाते। चिंतामणी के सहायक लेखकों में जगदीश प्रसाद थवाईत और लोकनाथ पुरोहित नाम के दो और व्यक्ति थे।लेखन कक्ष में राजा साहब के छोड़ किसी को भी प्रवेश की अनुमति नहीं थी।लेखकों से बाहर भी कोई व्यक्ति बात नहीं कर सकता था। ये लेखक अंतिम रूप दी गई और राजा साहब व्दारा टिक की गई रचनाओं को ब्लू ब्लैक इंक से ग्रंथ निर्माण के लिए लाए गए स्पेशल पेपर पर लेखनीबध्द करते। एक ब्लॉट भी नहीं पड़ने देते। चिंतामणी कश्यप को हेडक्लर्क का वेतन २० रूपए प्रतिमाह दिया जाता था। वे दरबार में राजा की मृत्युपर्यन्त रहे। नर्तन सर्वस्वमः-नर्तन सर्वस्वम कथक के अंग उपांग का संपूर्ण ग्रंथ है। मजबूत काली जिल्द से बंधा यह ग्रंथ खासतौर पर कथक नृत्य का सबसे बड़ा और प्रमाणिक ग्रंथ है।इसके मुख पृष्ट पर सुनहरे अक्षरों से लिखा हुआ है- ऩर्तन सर्वस्वम।उसके नीचे राजा चक्रधर सिंह का नाम है तथा सबसे नीचे १९३८ ई० लिखा हुआ है। नर्तन सर्वस्वम का मुख्य आधार है भरतमुनि प्रणीत नाट्य शास्त्र, राजा सवाई प्रताप सिंह जयपुर व्दारा लिखित और २५ जून १९१० को प्रकाशित राधा गोविंद संगीत सार, श्री दुर्गाप्रसाद व्दारा प्रणूत संगीत दर्पण। किवंदती यह भी है कि नर्तन सर्वस्वम का असली आधार विशाखदत्त प्रणीत नर्तन रहस्यम है। इसके श्लोक को संस्कृत भाषा में आबध्द करने वाले आचार्यों के नाम इस प्रकार हैं- जानकी वल्लभ शास्त्री,व्याकरणाचार्य पंडित सदाशिव दास, साहित्याचार्य पं० भगवान पांडे तथा कवि भूषण। दुर्लभ ग्रंथ नर्तन रहस्यम मे १००० से अधिक पृष्ट है। ३५० पृष्ठों की तो भूमिका ही है।इसे सबसे पहले सन १९३८ में अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन इलाहाबाद में अवलोकनार्थ रखा गया था। रायगढ में जो भी विद्ववान आते राजा साहब सबसे पहले उन्हें इसी ग्रंथ को दिखाते थे।राजा साहब के निधन के बाद वह ग्रंथ छोटी रानी लोकेश्वरी देवी के पास सन १९७७ तक रहा।इसके बाद महाराज कुमार सुरेन्द्र कुमार के हाथों सौंप दिया गया तब से ग्रंथ उन्हीं के पास सुरक्षित है। तालबल पुष्पाकर :- सुलेखक चिंतामणी कश्यप के अनुसार यह ग्रंथ भी अपूर्ण लिखा गया है।इसके लिए तबले के बोल परन रफ में बना कर तैयार हैं।१९४६ में राजा साहब की आज्ञा से खम्हार ऑफिस में कार्य करना पड़ा । हो सकता है इस ग्रंथ को जगदीश थवाईत जी ने तैयार किया हो। तालबल पुष्पाकर की रफ कॉपी मझले कुमार के पास अब भी उपलब्ध है।इसे तुलसी राम देवांगन, महेन्द्र प्रताप सिंह और प्यारे लाल श्रीमाल ने खुद अपनी आँखों से देखा है और इनके बीरे में कई जगह जिक्र भी किया है। इल ग्रंथ में राजा साहब ने तबले के इतिहास पर शुरू में प्रकाश डाला है ।तबले की उत्पत्ति ताल और बल से मानते हैं। तालबल पुष्पाकर के अनुसार ताल तो एक है राकेन्दु ताल जिसे त्रिताल कहा जाता है, पर यहाँ उपभेद २०५७ बतलाए गए हां।यहाँ कायदा,रेला,पेशकार और तिहाइयों का भी सुन्दर वर्णन हुआ है ।वास्तव में तालबल पुष्पाकर तबला पर ही केन्द्रित ग्रंथ है। तालतोय निधि:- तालतोय निधि शायद भारतीय नृत्य संगीत का संबसे बड़ा ग्रंथ है। इसका कुल वजन ३२ किलो है। इस ग्रंथ को १९३८ में शुरू किया गया था जो कि माघ स० १९९७ बसंत पंचमी, शनिवार, तारीख १/२/१९४१ को पूरा हुआ था। सुलेखक चिंतामणी कश्यप के अनुसार इसमें एक से लेकर २८४ मात्राओं तक के ताल आबध्द है। इसके तालों के बोल संस्कृत और हिन्दी दोनों में लिखे गए हैं। इसमें तालों के बोल, तालांग दून, चौगुने रेला एंव परण चक्र के अंदर लिखे गए हैं। इसमें १७,१९ जैसे विषम मात्रा के भी ताल हैं। राजा साहब ने उस्तादों को पर्याप्त धन देकर उन्हें खुश करके उनसे एक एक बोल प्राप्त किए थे। कहा जाता है नत्थू खां ने राजा साहब के सामने बुलबुल परण से बुलबुल को चहकाया था। वह परण भी इस ग्रंथ में शामिल है । कुछ विशिष्ट तालों के नाम है- सवारी ताल, सरस्वती ताल, सप्तमुख ताल, सन्तिपाल ताल, दशमुख ताल, कलिंग ताल, मठ ताल, रूद्र ताल, लक्ष्मण विलास ताल अादि। मुनीर खां, कादर बख्श, नत्थू खां, भूषण महाराज की भूमिका यहाँ संग्रहकर्ताओं में प्रमुख थी। मुरजपरण पुष्पाकर:- यंथा नामं तथा गुणं के मुहावरे को चरितार्थ करने वाला तीसरा ग्रंथ है।- मुरज परण पुष्पाकर । यह पखवज के बोल, परणों का खजाना है।इसमें ताल, परण,अणु, द्रुत,लघु, गुरूओं का विस्तार से वर्णन है। इस ग्रंथ को लिखने में तीन वर्ष (१९४३-१९४५)लगे। दरबार के नर्तक और वर्तमान में उनके शिष्यगण इसी ग्रंथ के बोल, परणों पर अधिकाँशतह नृत्य किया करते है। यह हरी और लाल जिल्दों की दो खण्डों में लिखा गया था । और यह ग्रंथ संदूककचीनुमा था, जिसे विशेष आर्डर देकर लंदन से बनवाया गया था । यह ग्रंथ भी संस्कृत भाषा में रंगीन चित्रों के साथ लिखा गया है । उसका हिन्दी अनुवाद भी दिया गया है । रागरत्न मंजूषा:- रागरत्न मंजूषा में १२०० राग-रागनियों का वंशवृक्ष सहित वर्णन है। इसकी पाण्डुलिपि शायद पंडित भूषण संगीताचार्य ने बनाई थी, रागरत्न मंजूषा संगीत पारिजात, अभिनव राग मंजरी जैसे प्रसिध्द ग्रंथों के आधार पर तैयार की गई थी। लेकिन सुलेखक चिंतामणी कश्यप बतलाते हैं यह ग्रंथ भी पूरा लिखा नहीं गया है सिर्फ राग के प्रकार गीत,सरगम आदि रफ में तैयार किया गया है । जैसा कि मझले कुमार बतलाते हैं उनके पास जीण-शीर्ण कापी है, उसमें भूषण महाराज के हस्ताक्षर है। इसमें राग और ३६ रागिनियों के अंग उपांगों का वर्णन है। इस ग्रंथ का आधार राग विबोध, रागमाला आदि ग्रंथ है। । (विस्तार से जानने के लिए देखे "रायगढ का सांस्कृतिक वैभव" लेखक डाँ०बलदेव ) -- Sent from Fast notepad

रायगढ़ का सांस्कृतिक वैभव ःलेखक डाँ. बलदेव

(रायगढ़ का सांस्कृतिक वैभव लेखक डाँ०बलदेव)राजा चक्रधर सिंह प्रणीत अनूठे संगीत ग्रंथः संगीत नृत्य संबंधी पाँच चर्चित ग्रंथ_ ___________________________ नर्तन सर्वस्व/तालतोय निधि/तालबल पुष्पाकर/मुरजपरण पुष्पाकर/रागरत्न मंजूषा राजा साहब जब कोई बोल या तोड़ा टुकड़ा या परणों का निर्माण करते तब पहले उसे रफ कॉपी में रिकॉर्ड करते।इसके ब ाद संगीतकारों के बीच उस पर गंभीर विचार विमर्श होता। कई कलाकार अपने अपने ढ़ंग से भाव प्रदर्शन से उस रचना को स्पष्ट करते। जिसमें ज्यादा खूबसूरती मिलती उसे भी अलग से दर्ज करते।इसके बाद राजा साहब अंत में स्वयं उसे तबले पर निकालते । जब संतुष्ट हो जाते और एक प्रकार से सभा में सहमति मिल जाती तब रचना पूरी मानी जाती ।राजा साहब के तबला वादन के साथ ही साथ कविगण उसे श्लोकबध्द करते और चित्रकार मुद्राओं का अंकन करते,यानी भाव प्रदर्शन , नर्तन, वादन के साथ ही साथ लेखन। जिस कवि का श्लोक तथा चित्रकार का चित्र सबसे अच्छा होता उसे फाइनल करते, रजिस्टर में दर्ज करवाते और लेखन कक्ष में भेज देते। पैलेस मैनेजर श्यामलाल जिन्होंने कि मोतीमहल के पहले तल्ले में लेखन कक्ष का चयन किया था, अपनी निगरानी में उसे चिंतामणी कश्यप से लिखवाते। चिंतामणी के सहायक लेखकों में जगदीश प्रसाद थवाईत और लोकनाथ पुरोहित नाम के दो और व्यक्ति थे।लेखन कक्ष में राजा साहब के छोड़ किसी को भी प्रवेश की अनुमति नहीं थी।लेखकों से बाहर भी कोई व्यक्ति बात नहीं कर सकता था। ये लेखक अंतिम रूप दी गई और राजा साहब व्दारा टिक की गई रचनाओं को ब्लू ब्लैक इंक से ग्रंथ निर्माण के लिए लाए गए स्पेशल पेपर पर लेखनीबध्द करते। एक ब्लॉट भी नहीं पड़ने देते। चिंतामणी कश्यप को हेडक्लर्क का वेतन २० रूपए प्रतिमाह दिया जाता था। वे दरबार में राजा की मृत्युपर्यन्त रहे। नर्तन सर्वस्वमः-नर्तन सर्वस्वम कथक के अंग उपांग का संपूर्ण ग्रंथ है। मजबूत काली जिल्द से बंधा यह ग्रंथ खासतौर पर कथक नृत्य का सबसे बड़ा और प्रमाणिक ग्रंथ है।इसके मुख पृष्ट पर सुनहरे अक्षरों से लिखा हुआ है- ऩर्तन सर्वस्वम।उसके नीचे राजा चक्रधर सिंह का नाम है तथा सबसे नीचे १९३८ ई० लिखा हुआ है। नर्तन सर्वस्वम का मुख्य आधार है भरतमुनि प्रणीत नाट्य शास्त्र, राजा सवाई प्रताप सिंह जयपुर व्दारा लिखित और २५ जून १९१० को प्रकाशित राधा गोविंद संगीत सार, श्री दुर्गाप्रसाद व्दारा प्रणूत संगीत दर्पण। किवंदती यह भी है कि नर्तन सर्वस्वम का असली आधार विशाखदत्त प्रणीत नर्तन रहस्यम है। इसके श्लोक को संस्कृत भाषा में आबध्द करने वाले आचार्यों के नाम इस प्रकार हैं- जानकी वल्लभ शास्त्री,व्याकरणाचार्य पंडित सदाशिव दास, साहित्याचार्य पं० भगवान पांडे तथा कवि भूषण। दुर्लभ ग्रंथ नर्तन रहस्यम मे १००० से अधिक पृष्ट है। ३५० पृष्ठों की तो भूमिका ही है।इसे सबसे पहले सन १९३८ में अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन इलाहाबाद में अवलोकनार्थ रखा गया था। रायगढ में जो भी विद्ववान आते राजा साहब सबसे पहले उन्हें इसी ग्रंथ को दिखाते थे।राजा साहब के निधन के बाद वह ग्रंथ छोटी रानी लोकेश्वरी देवी के पास सन १९७७ तक रहा।इसके बाद महाराज कुमार सुरेन्द्र कुमार के हाथों सौंप दिया गया तब से ग्रंथ उन्हीं के पास सुरक्षित है। तालबल पुष्पाकर :- सुलेखक चिंतामणी कश्यप के अनुसार यह ग्रंथ भी अपूर्ण लिखा गया है।इसके लिए तबले के बोल परन रफ में बना कर तैयार हैं।१९४६ में राजा साहब की आज्ञा से खम्हार ऑफिस में कार्य करना पड़ा । हो सकता है इस ग्रंथ को जगदीश थवाईत जी ने तैयार किया हो। तालबल पुष्पाकर की रफ कॉपी मझले कुमार के पास अब भी उपलब्ध है।इसे तुलसी राम देवांगन, महेन्द्र प्रताप सिंह और प्यारे लाल श्रीमाल ने खुद अपनी आँखों से देखा है और इनके बीरे में कई जगह जिक्र भी किया है। इल ग्रंथ में राजा साहब ने तबले के इतिहास पर शुरू में प्रकाश डाला है ।तबले की उत्पत्ति ताल और बल से मानते हैं। तालबल पुष्पाकर के अनुसार ताल तो एक है राकेन्दु ताल जिसे त्रिताल कहा जाता है, पर यहाँ उपभेद २०५७ बतलाए गए हां।यहाँ कायदा,रेला,पेशकार और तिहाइयों का भी सुन्दर वर्णन हुआ है ।वास्तव में तालबल पुष्पाकर तबला पर ही केन्द्रित ग्रंथ है। तालतोय निधि:- तालतोय निधि शायद भारतीय नृत्य संगीत का संबसे बड़ा ग्रंथ है। इसका कुल वजन ३२ किलो है। इस ग्रंथ को १९३८ में शुरू किया गया था जो कि माघ स० १९९७ बंसत पंचमी ,शनिवार , तारीख १/२/१९४१ को पूरा हुआ था। सुलेखक चिंतामणी कश्यप के अनुसार इसमें एक से लेकर २८४ मात्राओं तक के ताल आबध्द है। इसके तालों के बोल संस्कृत और हिन्दी दोनों में लिखे गए हैं। इसमें तालों के बोल, तालांग दून,चौगुने रेला एंव परण चक्र के अंदर लिखे गए हैं। इसमें १७,१९ जैसे विषम मात्रा के भी ताल हैं। राजा साहब ने उस्तादों को पर्याप्त धन देकर ,उन्हें खुश करके उनसे एक एक बोल प्राप्त किए थे। कहा जाता है नत्थू खां ने राजा के सामने बुलबुल परण से बुलबुल को चहकाया था। वह परण भी इस ग्रंथ में शामिल है ।कुछ विशिष्ट तालों के नाम हैं -- सवारी ताल, सरस्वती ताल,सप्तमुख ताल,सन्तिपाल ताल, दशमुख ताल, कलिंग ताल, लक्ष्मण विलास ताल अादि। मुरजपरण पुष्पाकर:- यथां नामं तथा गुणं के मुहावरे को चरितार्थ करने वाला तीसरा ग्रंथ है- मुरज परण पुष्पाकर । यह पखवज के बोल,परणों का खजाना है।इसमें ताल,परण,अंग,अणु, द्रुत, लघु, गुरूओं का विस्तार से वर्णन है। इस ग्रंथ को लिखने में तीन वर्ष (१८४३-१९४५) लगे। दरबार के नर्तक और वर्तमान में उनके शिष्यगण इसी ग्रंथ के बोल,परणों पर अधिकाँशतह नृत्य किया करते है। यह हरी और लाल जिल्दों की दो खण्डों में लिखा गया था । उसका हिन्दी अनुवाद भी दिया गया है । रागरत्न मंजूषा:- रागरत्न मंजूषा में १२०० राग-रागनियों का वंशवृक्ष सहित वर्णन है। इसकी पाण्डुलिपि शायद पंडित भूषण संगीताचार्य ने बनाई थी, राग रत्न मंजूषा संगीत पारिजात,अभिनव राग मंजरी जैसे प्रसिध्द ग्रंथों के आधार पर तैयार की गई थी।लेकिन सुलेखक चिंतामणी कश्यप बतलाते हैं यह ग्रंथ भी पूरा लिखा नहीं गया है सिर्फ राग के प्रकार गीत,सरगम आदि रफ में तैयार किया गया है । जैसा कि मझले कुमार बतलाते हैं उनके पास जीण-शीर्ण कापी है, उसमें भूषण महाराज के हस्ताक्षर है। इसमें राग और ३६ रागिनियों के अंग उपांगों का वर्णन है इस ग्रंथ का आधार राग विबोध, रागमाला आदि ग्रंथ है। (विस्तार से जानने के लिए देखे:- रायगढ का सांस्कृतिक वैभव:- लेखक डाँ०बलदेव) -- Sent from Fast notepad

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

कविता:सिसरिंगा की घाटियाँ (कवि:डाँ. बलदेव)

सिसरिंगा की घाटियाँ
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 बीजा - साजा साल की 
छाँव में चितकबरे शशक शावक - सी
 लुक - छिप कई मोड़ माँद नदी तक छलांगती 
नील गाय सी बग टूट कहीं पर भागती 
चढ़ती ऊँची चट्टानों पर 
उतरती नीची ढलानों पर 
सिसरिंगा की घाटियाँ 
 सूर्य - मुखी जूड़े में घोंसे
 इठलाती आती चमचमाती सिसरिंगा की घाटियाँ
 कभी आगे कभी पीछे से 
लहरा क़र तेजी से लिपट जाती
 पथिक के पाँव में 
 मनुहार करती क्षणभर विलम जाने को 
करील - कुंज की छाँव में 
 इसे रूक जरा बाँह में गह लो
इसे आँख में भर लो
इसे गाओ 
इसे जिओ यह तुम्हें भी उरावों की गंध भीगी बालियों में गाएगी़ 
 तलहटियों के गाँव में ले जाएगी। 
 पलाशों की सिन्दुरिया माला पहिनाएगी 
 हँस- हँसकर बतराएंगी
इसकी सहेलियाँ गोंड़ महकूल और बैगा की बिटियाँ दोनों भर मधु में पगे चिरोंजी तुम्हें खिलाएंगी 
जी भर अंजुरियों से प्यास बुझाएगी
 वह तुमसे एक बार मिलने का वादा लेकर ही
 नन्दन झरिया या स्वप्निल झरने का पता बताएगी । सिंघनपुर की आदिम गुफाएँ या कबरा की पहाड़ियों के पाषाण चित्रों तक सहर्ष ले जाएगी, 
पहाड़ियों पर उतरते बादलों को देखकर इस उन्मत्त मयूरी के कर्मा नृत्य की लय में तुम जरा झूमो 
इनकी सतरंगी गहराइयों में उतरो 
 डूब- तिरो 
इसे साँस से छुओ 
यह हमेशा के लिए याद में 
महुए की गंध सी बसन्त सी छा जाएगी। 
 यदि तुम कहीं ठुकराओगे 
आहत प्यार इसका झूमकर डस लेगा तुम्हें
 यदि कहीं दोगे धोखा 
चूड़ियाँ तोड़कर मर्दाना कलाइयाँ इसकी बेधड़क गंडासा गर्दन पर ले जाएगी 
जरा चूको हजारों फीट गहरी दलदली खाइयों में बेहिचक धकेल देगी 
और उलझोगे तो शेेरनी सी गुर्राएगी ।
 जब यह उमड़ती है दहाड़ इसकी मीलों फैल जाती है
 जर्रा ज़र्रा चौधियाता चीखकर भड़क उठता है 
बस या बुलेट पर हो ........ रूको , जरा हुजूर को पहले सलामी दो 
तब बढ़ो आगे दबेे पाँव पीछा कर रही है 
जबड़ा खोलेे लार टपकाती 
मादा रीछ सी रूमाल हिलाकर 
बुलाती मखमली वादियाँ मदमाती सिसरिंगा की घाटियाँ ।

 डाँ बलदेव 
रायगढ़, छत्तीसगढ़
प्रस्तुति:-बसन्त राघव

बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

समीक्षा -डाँ. राजू पाण्डेय

स्व. कौशल प्रसाद दुबे जी की मीरा का केवल पाठ करना इस कृति के साथ संपूर्ण न्याय नहीं कर पायेगा;स्व. दुबे जी की "मीरा" एक अलौकिक आध्यात्मिक अनुभूति की ओर पाठक की चेतना को अग्रसर करती है। परम पूज्य अघोरेश्वर भगवान राम जी का कथन है-एकाकार को जानने से अच्छा है हमारी यह विरह व्याकुलता;क्योकि उससे मिलने के बाद तो अंत हो जाता आदमी।उसकी आशा में बैठे; उसके विश्वास में बैठे; जो हमारी प्रतीक्षा है यह हमारा बड़ा ही कल्लोल्मय ; आंनदमय ; बड़ा ही बच्चो की किलकारियो़ की तरह मुग्ध -मुग्ध कर देने वाला समय होता है। "मीरा" - एक अनंत प्रतीक्षा" इसी प्रतीक्षा की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है। स्व. कौशल प्रसाद दुबे जी की "मीरा" को शास्त्रीय काव्य सिघ्दांतों के आधार पर वर्गीकृत करने के लिए बड़ी रोचक बहस हो सकती है कि मुक्त छंद में रची गयी यह कृति गेयता के गुण के अभाव के बावजूद भावनाओं की त्वरा एंव प्रेम तथा करूणा की अंतधारा के कारण गीति काव्य के रूप में वर्गीकृत किये जाने के योग्य है अथवा नहीं । इसी प्रकार इसके खण्डकाव्यात्मक आकार को लेकर भी बुघ्दि विलास किया जा सकता है। किन्तु इन चर्चाओं से "मीरा" के मूल तत्व की उपेक्षा ही होगी। स्व. कौशल प्रसाद दुबे जी की " मीरा" ;मीरा के जीवन और रचना संसार का उनका अपना पाठ है। भक्ति परम्परा में साख्य भाव हिन्दू धर्म की अद्वितीय विशेषता है।जहाँ विश्व के अनेक धर्मों मेें ईश्वर एवं मनुष्य के मध्य दास एवं स्वामी के सम्बन्ध को प्रधानता दी गयी है; अपवाद स्वरूप अमेरिकन कवियित्री एमिली डिकिन्सन (१८३०-१८८६) का उल्लेख यहा पर अनिवार्य हो जाता है जिन्होंने क्राइस्ट को पति के रूप में पूजा था एवं ब्राइडल पोयम्स की रचना की थी जिन्हें पढ़कर अनायास ही मीरा का स्मृति हो अाती है। जब स्व. कौशल प्रसाद दुबे जी की "मीरा" को पढ़ रहा था तो अनायास एमिली की पंक्तियां मन में कौंध जाती थी ।इस समानता का एक ही कारण हो सकता है। विश्व के सारे घर्म उस अज्ञात -अविनाशी के अस्तित्व को मानते है जो दुनिया का संचालन करता है। जब उसकी आराधना के लिए भक्त निकलता है तो देश-काल और साधना पघ्दति चाहे जो हो वह आध्यात्मिक अनुभूति समान होती है। स्व.कौशल जी की मीरा विभिन्न युगों की यात्रा पल भर में कर लेती है; मार्ग में जो कुछ दिखता है- यथार्थ भी हो सकता है और कल्पना भी - किन्तु वह जिसमनोदशा में है उसके लिए एेसे भेद गौण और महत्वहीन है। उस अलौकिक जगत के रंग;गंध और ध्वनियाँ शाब्दिक रूप से व्यक्त करने में कठिन हैं, फिर भी जहाँ तक भाषा जा सकती है वहाँ तक स्व. कौशल जी गए हैं। जब तक जरा-व्याधि-मरण की सीमाओं से बंधा हुआ मनुष्य आत्मसाक्षात्कार के लिए प्रयत्नशील रहेगा, तब तक कृष्ण और क्राइस्ट अपनी अपार करूणा और प्रेम की वर्षा करते रहेंगे और विरहिणी मीरा की अनंत यात्रा जारी रहेगी। समीक्षक- डाँ. राजू पाण्डेय,हंडी चौक रायगढ़ ४९६००१छत्तीसगढ़ -- Sent from Fast notepad